Colleagues fighting over money

प्रस्तावना

मनुष्य जब जन्म लेता है, तब वह संसार के मोह, माया और लोभ से पूर्णतः अनभिज्ञ होता है। एक छोटे बच्चे की आवश्यकताएँ सीमित होती हैं और प्रकृति उसके जीवन के लिए आवश्यक सभी व्यवस्थाएँ किसी न किसी रूप में उपलब्ध करा देती है।

किंतु जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, वह संसार के विभिन्न आकर्षणों, इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं से परिचित होने लगता है। यहीं से उसके जीवन में मोह, माया, स्वार्थ और लोभ का प्रवेश होता है।

मानव जीवन में इच्छाएँ स्वाभाविक हैं। इन्हीं इच्छाओं के कारण मनुष्य सीखता है, संघर्ष करता है और प्रगति करता है। किंतु जब इच्छाएँ संतुलन खो देती हैं और आवश्यकता से अधिक पाने की चाह में बदल जाती हैं, तब वे लोभ का रूप धारण कर लेती हैं।

लोभ का स्वरूप: महत्वाकांक्षा और लालच के बीच की रेखा

वास्तव में मानव जीवन की अनेक भावनाएँ उसके विकास के लिए आवश्यक हैं। बेहतर जीवन, सम्मान, ज्ञान और सफलता प्राप्त करने की इच्छा मनुष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। लेकिन जब यही इच्छा किसी भी कीमत पर अधिक पाने की अंधी चाह में बदल जाती है, तब वह लोभ बन जाती है।

लोभ केवल धन का ही नहीं होता। पद का लोभ, शक्ति का लोभ, प्रसिद्धि का लोभ, प्रेम पाने का लोभ, सम्मान का लोभ और सुख-सुविधाओं का लोभ भी उतना ही प्रभावशाली होता है। जब तक ये इच्छाएँ व्यक्ति को परिश्रम, ईमानदारी और सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं, तब तक वे लाभदायक हैं। किंतु जब इन्हें प्राप्त करने के लिए व्यक्ति अपने सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों से समझौता करने लगता है, तब लोभ अपना विनाशकारी स्वरूप दिखाने लगता है।

लोभ पर श्रीमद्भगवद्गीता का दृष्टिकोण

भारतीय दर्शन में लोभ को मनुष्य के प्रमुख शत्रुओं में गिना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने लोभ को मनुष्य के पतन का कारण बताया है। गीता के 16 वें अध्याय के 21वें श्लोक में कहा गया है—

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।

(अर्थात् काम, क्रोध और लोभ—ये तीन नरक के द्वार हैं, जो मनुष्य का नाश करते हैं। इसलिए इनका त्याग करना चाहिए।)

भगवान कृष्ण यह भी बताते हैं कि जब मनुष्य सांसारिक वस्तुओं और फलों के प्रति अत्यधिक आसक्त हो जाता है, तब उसका विवेक कमजोर पड़ने लगता है। विवेक के नष्ट होने पर सही और गलत का भेद समाप्त हो जाता है, और यहीं से पतन की शुरुआत होती है।

दैनिक जीवन और समाज में लोभ के दुष्परिणाम

शिक्षा के क्षेत्र में लोभ

अच्छे अंक प्राप्त करने और सफल बनने की इच्छा स्वाभाविक है। यही इच्छा विद्यार्थियों को मेहनत करने और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती है। किंतु जब अधिक अंक पाने का लोभ नियंत्रण से बाहर हो जाता है, तब कुछ विद्यार्थी नकल, धोखाधड़ी और अनुचित साधनों का सहारा लेने लगते हैं। ऐसी सफलता क्षणिक हो सकती है, लेकिन यह चरित्र और आत्मविश्वास को कमजोर कर देती है।

कार्यक्षेत्र में लोभ

नौकरी मिलने के बाद बेहतर जीवन जीने की इच्छा भी स्वाभाविक है। परंतु जब व्यक्ति अत्यधिक धन और वैभव प्राप्त करने की अंधी दौड़ में शामिल हो जाता है, तब वह भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और बेईमानी जैसे रास्तों की ओर आकर्षित होने लगता है। लोभ धीरे-धीरे उसके नैतिक मूल्यों को समाप्त कर देता है और अंततः उसकी प्रतिष्ठा तथा मानसिक शांति दोनों छीन लेता है।

सिनेमा और इतिहास में लोभ का सजीव चित्रण

इतिहास इस बात का साक्षी है कि अनियंत्रित लोभ ने अनेक व्यक्तियों और साम्राज्यों का पतन किया है। महाभारत का विनाशकारी युद्ध भी दुर्योधन के राज्य और सत्ता के प्रति अनियंत्रित लोभ का परिणाम था।आधुनिक सिनेमा में भी लोभ के इस विनाशकारी स्वरूप को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

दक्षिण भारतीय फिल्म ‘तुम्बाडइसका उत्कृष्ट उदाहरण है। फिल्म का मुख्य पात्र धन प्राप्त करने के लोभ में इतना अंधा हो जाता है कि वह अपने जीवन की शांति, रिश्तों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य तक को दांव पर लगा देता है।

फिल्म का मूल संदेश अत्यंत गहरा है—

“यह धरती मनुष्य की आवश्यकताएँ पूरी कर सकती है, लेकिन उसका लालच नहीं।”

यह संदेश हमें याद दिलाता है कि जब मनुष्य की इच्छाएँ उसकी आवश्यकताओं से बड़ी हो जाती हैं, तब लोभ उसका स्वामी बन जाता है और विनाश निश्चित हो जाता है।

निष्कर्ष

लोभ प्रारंभ में मनुष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता हुआ प्रतीत हो सकता है, किंतु जब वह नियंत्रण से बाहर हो जाता है, तब वही प्रेरणा विनाश का कारण बन जाती है। इसलिए जीवन में इच्छाएँ और महत्वाकांक्षाएँ रखना आवश्यक है, परंतु उनसे भी अधिक आवश्यक है संतोष, आत्मसंयम और नैतिकता।

जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश है—मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर नहीं। जो व्यक्ति अपने कर्तव्य पर ध्यान देता है और लोभ को अपने विवेक पर हावी नहीं होने देता, वही वास्तविक अर्थों में सुखी, सफल और संतुलित जीवन जी पाता है।

अंततः, लोभ का त्याग करने का अर्थ इच्छाओं का त्याग करना नहीं है, बल्कि इच्छाओं पर नियंत्रण स्थापित करना है। यही नियंत्रण मनुष्य को पतन से बचाकर उन्नति की ओर ले जाता है।

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